Categories
विनीत

शब्द संग्रह:-०८

शब्द-संग्रह-०८

सत्य कहा करते समाज में,

समय बड़ा बलशाली है ।

वही चला सकता है इसको,

जो पूर्ण प्रतिभाशाली है ।

और प्रतिभामान, व्यक्ति वही हैं ।

जो पालन करते समय सिद्धांत,

खटक तनिक न जिनको इनकी,

कृतज्ञहिन वह व्यक्ति समान ।

संस्कार ही ! भारतचरित्र है ।

इतिहासों में ऐसा वर्णन हुआ।

परम पूज्य आदरणीयों से,

भारतचरित्र उज्जवल हुआ ।

विनीत

राम रंजन कुमार

Categories
विनीत

शब्द संग्रह:- ०७

शब्द-संग्रह-०७

तीन वर्ष का, हुआ जगत में ।

लोग हुए तब । हितकारी ।

विकल दृष्टि । समय की आयी ।

पड़ी आ विपदा भरी ।

अरे ! नवजन्म है । इस जीवन तो!

करो कार्य हितकारी ।

नवकलाओं से नवरचना करो भी,

बनो जगत आधिकारी !

पाकर जन्म । तुम इस जगत में,

श्रिणिप्राण हो गए हो ।

क्या-क्या न दिया इसने ?

फिर क्यूँ? प्राणभक्त सोये हो ।

विनीत

राम रंजन कुमार

Categories
विनीत

शब्द संग्रह:-०६

शब्द-संग्रह-०६

प्राणवस्तु तो परम पुण्य है।

निश्छल, निर्मल, कोमल भी।

लोभ से परे । ये शीतल हैं।

बिन्दु, प्रारंभ भी । अंत भी ।

तो किस क्षण के लिये, जिये लोभ में ।

क्षण है । परम तरल भी ।

हर क्षण उठते रचना मन में ।

सघन और प्रबल भी ।

ईश्वर की रचना में पलनेवाले,

कर उनकी सम्मान !

समयभक्ति, न तो प्राणभक्ति कर ।

नवभारत ! निर्माण ।

विनीत

राम रंजन कुमार

Categories
विनीत

शब्द संग्रह:- ०५

शब्द संग्रह:-०५

किस क्षण के लिये? दिये प्राण हैं ।

कर ज्योति सम्मान ।

कर प्रकाश से जागृत,

तु नव भारत निर्माण !

भारत की भू पे जन्म लेके।

भूमण्डल का शुद्ध कण लेके।

नर धर्म यदि हम धर लेते,

कुछ कर्म यदि हम कर लेते?

इतिहाश समर हम कर लेते!

साम्राज्य समर हम कर लेते।

महाराज्य स्थापित करके उनका?

हम राज्य स्थापित कर लेते!

विनीत

राम रंजन कुमार

Categories
विनीत

शब्द संग्रह:-०४

शब्द-संग्रह-०४

स्वर उठता है। राम कथन से,

सतयुग के सिता से ।

स्वर उठता हनुमन्त के,

राम भक्त प्रणेता से ।

मैं अपनी बिंदु, प्रारम्भ करूँ ।

जग में रचना आरम्भ करूँ ।

स्वर सुरु । शब्द से हो मेरे ।

जनगणना प्रारम्भ करूँ ।

जब होश आया । इस जीवन में,

लहरों की पवन से,

दृश्य प्रफुल्लित, दिखा सुनहरा ।

लोग दिखे तन मन से ।

विनीत

राम रंजन कुमार

Categories
विनीत

शब्द संग्रह:-०२

शब्द संग्रह:-०२

एक भी शब्द न मेरा,

रचनाकारों की रचना है यह!

एक भी पद न मेरा,

ईश्वर की संरचना है यह!

तो पढ़ लो। यह रचना तुम भी,

ताकि रच लो साम्राज्य यहाँ।

क्यूँकि पुनः स्थापित होगा,

उनका महासाम्राज्य यहाँ ।

किस विस्मय में? जी रहे!

अहंकारों की बूँद से ।

एक ओस की बूँद भी,

कहीं ज़्यादा है। उन बूँद से।

विनीत

राम रंजन कुमार

Categories
विनीत

शब्द संग्रह:- ०१

शब्द संग्रह:- ०१

आलोचनाएँ को खनन करना,

प्रश्नो की कटार से ?

छिपा लो मन में व्यथा ।

आलोचनाएँ की क़तार से ।

इस पूस की रात को ,

न जाने कैसी आह लगी?

ठंड भरी इस ठाठ को,

जाने कब ओलों से व्याह लगी?

हुआ हूँ ! जन्मा ऐसी रातों में,

तो जीवन न ठिठुरेगा ।

रुक न पाये कदम कभी यह,

क्यूँ न? पगडंडी की राह लगी।

विनीत राम रंजन कुमार

Categories
विनीत

“स्वयंसंगिरथि”

“स्वयंसंगिरथी

इस

संग्रह के शब्दों को मैं अपने

देश “भारत” को समर्पित करता

हूँ। और इनमें जो शब्द हैं ओ

मेरी भावना व्यक्त करते हैं

कि मेरी सोच खुद के प्रति क्या

है। इसलिये इस शब्दक्रम संग्रह

का नाम “स्वमसंगिरथी” रखा

है।अगर

मेरी वाक्य रचनायें में त्रुटि

हो तो हमें क्षमा प्रदान करें।

विनीतराम

रंजन कुमार