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शब्द संग्रह: ११

तिरंगे तरंग यह देख,
आश्चर्यचकित यह रचना है।
रंग चक्र से बना यह,
समूह संगठित संरचना है
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शब्द संग्रह: १०

क्या सुनाऊं? क्या बताऊं?
मन में मेरे क्या है।
दिव्य ज्योति या कमल कलश है,
कैसी ये? बस कथा है ।

गिनती हैं। अनगिनत मेरे,
भूकन से बना, ये संखा है।
टूटी हैं, जिनकी पंखुड़ियां,
दुख की ये व्यथा है।

सुख दुख के इस कीर्तन में,
संख ध्वनि धमकता है।
धूमिल रंग हैं, अनगिनत जिसमें,
फिर क्यूं मन बहक्ता है।

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शब्द संग्रह: ०९

प्रसंग: ०९”

अजब समस्या, शीतल मन में,

दृग से दृश्य कुछ दिखता है ।

देखना भी न चाहता, तनिक मन मेरा,

फिर क्यों अनल दहकता है।

अनल शीतल विलोम अर्थ है,

बिप्रिथार्थक है, मन मेरा ।

नहीं चाहता, कश्मा काश हो,

ये क्षण भर का जीवन मेरा ।

इस चार दिनों के जीवन में,

बहुत विफल रहा है, पथ मेरा।

कोई तो है इंतेज़ार में,तभी रुका है, पथ मेरा ।।

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विनीत

शब्द संग्रह:-०८

शब्द-संग्रह-०८

सत्य कहा करते समाज में,

समय बड़ा बलशाली है ।

वही चला सकता है इसको,

जो पूर्ण प्रतिभाशाली है ।

और प्रतिभामान, व्यक्ति वही हैं ।

जो पालन करते समय सिद्धांत,

खटक तनिक न जिनको इनकी,

कृतज्ञहिन वह व्यक्ति समान ।

संस्कार ही ! भारतचरित्र है ।

इतिहासों में ऐसा वर्णन हुआ।

परम पूज्य आदरणीयों से,

भारतचरित्र उज्जवल हुआ ।

विनीत

राम रंजन कुमार

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विनीत

शब्द संग्रह:- ०७

शब्द-संग्रह-०७

तीन वर्ष का, हुआ जगत में ।

लोग हुए तब । हितकारी ।

विकल दृष्टि । समय की आयी ।

पड़ी आ विपदा भरी ।

अरे ! नवजन्म है । इस जीवन तो!

करो कार्य हितकारी ।

नवकलाओं से नवरचना करो भी,

बनो जगत आधिकारी !

पाकर जन्म । तुम इस जगत में,

श्रिणिप्राण हो गए हो ।

क्या-क्या न दिया इसने ?

फिर क्यूँ? प्राणभक्त सोये हो ।

विनीत

राम रंजन कुमार

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विनीत

शब्द संग्रह:-०६

शब्द-संग्रह-०६

प्राणवस्तु तो परम पुण्य है।

निश्छल, निर्मल, कोमल भी।

लोभ से परे । ये शीतल हैं।

बिन्दु, प्रारंभ भी । अंत भी ।

तो किस क्षण के लिये, जिये लोभ में ।

क्षण है । परम तरल भी ।

हर क्षण उठते रचना मन में ।

सघन और प्रबल भी ।

ईश्वर की रचना में पलनेवाले,

कर उनकी सम्मान !

समयभक्ति, न तो प्राणभक्ति कर ।

नवभारत ! निर्माण ।

विनीत

राम रंजन कुमार

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विनीत

शब्द संग्रह:- ०५

शब्द संग्रह:-०५

किस क्षण के लिये? दिये प्राण हैं ।

कर ज्योति सम्मान ।

कर प्रकाश से जागृत,

तु नव भारत निर्माण !

भारत की भू पे जन्म लेके।

भूमण्डल का शुद्ध कण लेके।

नर धर्म यदि हम धर लेते,

कुछ कर्म यदि हम कर लेते?

इतिहाश समर हम कर लेते!

साम्राज्य समर हम कर लेते।

महाराज्य स्थापित करके उनका?

हम राज्य स्थापित कर लेते!

विनीत

राम रंजन कुमार

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विनीत

शब्द संग्रह:-०४

शब्द-संग्रह-०४

स्वर उठता है। राम कथन से,

सतयुग के सिता से ।

स्वर उठता हनुमन्त के,

राम भक्त प्रणेता से ।

मैं अपनी बिंदु, प्रारम्भ करूँ ।

जग में रचना आरम्भ करूँ ।

स्वर सुरु । शब्द से हो मेरे ।

जनगणना प्रारम्भ करूँ ।

जब होश आया । इस जीवन में,

लहरों की पवन से,

दृश्य प्रफुल्लित, दिखा सुनहरा ।

लोग दिखे तन मन से ।

विनीत

राम रंजन कुमार

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शब्द संग्रह:- ०३

शब्द-संग्रह-०३

सृष्टि के निर्माणकर्ता,

ओ भी अब आघाते हैं।

किसे सौंप दिया? भूमंडल !

जो तनिक नहीं, पछताते हैं।

इस भीषण विध्वंश का,

तुम स्वयं ज़िम्मेवार हो।

है सर्वस्य तुम्हारा भूमंडल,

जिसके तुम हक़दार हो।

कुछ कर दो बदलाव यहाँ।

इस वर्ष के आगमन में,

क्या है? तुम्हारा या मेरा ।

हम “भारत परिवार” हैं।

विनीत

राम रंजन कुमार

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विनीत

शब्द संग्रह:-०२

शब्द संग्रह:-०२

एक भी शब्द न मेरा,

रचनाकारों की रचना है यह!

एक भी पद न मेरा,

ईश्वर की संरचना है यह!

तो पढ़ लो। यह रचना तुम भी,

ताकि रच लो साम्राज्य यहाँ।

क्यूँकि पुनः स्थापित होगा,

उनका महासाम्राज्य यहाँ ।

किस विस्मय में? जी रहे!

अहंकारों की बूँद से ।

एक ओस की बूँद भी,

कहीं ज़्यादा है। उन बूँद से।

विनीत

राम रंजन कुमार