शब्द-संग्रह-०६

प्राणवस्तु तो परम पुण्य है।

निश्छल, निर्मल, कोमल भी।

लोभ से परे । ये शीतल हैं।

बिन्दु, प्रारंभ भी । अंत भी ।


तो किस क्षण के लिये, जिये लोभ में ।

क्षण है । परम तरल भी ।

हर क्षण उठते रचना मन में ।

सघन और प्रबल भी ।


ईश्वर की रचना में पलनेवाले,

कर उनकी सम्मान !

समयभक्ति, न तो प्राणभक्ति कर ।

नवभारत ! निर्माण ।



विनीत

राम रंजन कुमार