शब्द संग्रह:- ०१


आलोचनाएँ को खनन करना,

प्रश्नो की कटार से ?

छिपा लो मन में व्यथा ।

आलोचनाएँ की क़तार से ।


इस पूस की रात को ,

न जाने कैसी आह लगी?

ठंड भरी इस ठाठ को,

जाने कब ओलों से व्याह लगी?


हुआ हूँ ! जन्मा ऐसी रातों में,

तो जीवन न ठिठुरेगा ।

रुक न पाये कदम कभी यह,

क्यूँ न? पगडंडी की राह लगी।

विनीत राम रंजन कुमार